Kopi Luwak – World Most Expensive Coffee :- आमतौर पर कॉफी के फलों को पेड़ से तोड़ने के बाद, फैक्ट्री में प्रोसेस करके तैयार करके मार्केट में बेच दिया जाता है। लेकिन लूवक (Luwak) कॉफी के बीजों को प्रोसेस होने से पहले एक अनोखी या यूं कहे की घिनोनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। जिसमे की इनके फलों को सिविट जानवरो को खिलाया जाता है और सुबह उसके मल को इकठ्ठा किया जाता है। लूवक कॉफी का मुख्य उत्पादन इंडोनेशिया में होता है। इसे विशव की सबसे महंगी कॉफी होने का खिताब प्राप्त है जिसकी कीमत इसके स्वाद के अनुसार 2 लाख रुपए प्रति किलो तक है। इसके स्वाद और महक की पूरी दुनिया दीवानी है।

सिविट (Civet) जानवर के पेट में बढ़ता है इसका स्वाद :
पेड़ से तोड़े गए लूवक कॉफी के लाल – लाल फल, रात को सिविट को खिलाय जाते है। सिविट फलों के ऊपरी हिस्से को तो डाइजेस्ट कर लेते है पर बीज को डाइजेस्ट नहीं कर पाते है। यह बीज सुबह उसके मल के साथ बाहर आ जाते है, जिन्हे की धोकर इकठ्ठा करके आगे की प्रक्रिया के लिए भेज दिया जाता है। लूवक कॉफी का स्वाद जिसकी की दुनिया दीवानी है, इस विशेष प्रक्रिया के कारण ही आता है। इसके लिए सिविट की डाइट का भी विशेष ध्यान रखा जाता है। सिविट को सुबह के नाश्ते में शहद और फिश दी जाती है और लंच में सेब, केला और गाजर।
मूषक बिलाव भी कहते है सिविट को :
सिविट, इंडोनेशिया में पाया जाने वाला प्राणी होता है जो की बिल्ली और चूहे का मिला जुला रूप है । इसकी विशेषता यह होती है कि यह कॉफी के बेहतरीन फलों को छांट – छांट कर खाता है। शुरूआती समय में सिविट को पिंजरों में बंद करके नहीं रखा जाता था वो कॉफी बागानों में घूमते हुए फल खाया करते थे और बीजो को बागान में कही भी निकाल देते थे। फिर कर्मचारी सुबह पुरे बागान में घूम घूम कर इन बीजो को इकठ्ठा किया करते थे। चुकी इस तरह से बहुत काम मात्रा में बीज इकठ्ठे होते थे इसलिए उस जमाने में यह कॉफी और भी महँगी हुआ करती थी। बाद में इनकी बढ़ती डिमांड पूरा करने के लिए इन्हे पिंजरों में कैद करके रखा जाने लगा।

कैसे हुई इस तरीके की खोज ? :
अब सबसे अहम सवाल यह की आखिर कैसे पता चला की लूवक के फलों के सिविट के पेट में डाइजेस्ट होने के बाद उसके बीजो में स्वाद बढ़ जाता है ? इसका जवाब जानने के लिए हमे 2 शताब्दी पूर्व के इतिहास में जाना पडेगा। 19 वि शताब्दी के पूर्वार्ध में डच लोगो ने इंडोनेशिया में कॉफी के बागान लगाए। यहाँ पैदा होने वाली कॉफी अपने स्वाद के कारण काफी प्रसिद्ध हो गई। इसलिए 1850 के आस पास डच लोगों ने बागानों में काम करने वाले कर्मचारियों और स्थनीय निवासियों पर, अपने प्रयोग के लिए, निचे गिरे हुए फलों के उठाने पर भी पाबंदी लगा दी। लेकिन तब तक स्थानीय निवासियों पर कॉफी का स्वाद चढ़ चुका था। सो उनको कॉफी की इच्छा रहती थी। लेकिन सवाल था की उन्हें हासिल कैसे करे ? उन्हें यह पता था की सिविट जो फल खाते है उनके बीज वो सुबह मल के साथ बाहर निकाल देते है। इसलिए उन लोगों ने उन बीजों को इकठ्ठा करके, धो कर, काम में लेना शुरू कर दिया। काम में लेने पर उन्हें पता चला की इनका स्वाद तो पहले की अपेक्षा काफी बढ़ चूका है। धीरे धीरे इसकी खबर डच लोगो तक पहुंची जब उन्होंने इसे पीया तो वो भी इसके कायल हो गए और फिर इसका उत्पादन इस तरह ही होने लगा।

है दुनिया की सबसे महँगी कॉफी :
इसे संसार की सबसे महँगी कॉफी होने का गौरव प्राप्त है जिसकी कीमत 25000 रुपए से 100000 रुपए प्रति किलो है। लेकिन यदि आप जंगल में खुले घूमने वाले सिविट के बीजो की कॉफी लेना चाहे तो आपको 2 लाख रूपये प्रति किलो ग्राम तक खर्च करने पड़ेंगे। वही इसकी एक कप कॉफी पीने के लिए आपको 2500 से 5000 रुपए खर्च करने पड़ेंगे। भारत में आपको यह कॉफी केवल कुछ चुनिंदा मल्टी ब्रांड रिटेल स्टोर पर मिल सकती है।

शरीर के लिए भी है लाभदायक :
यह कॉफी पेट के लिए काफी लाभदायक होती है। इससे हमारे डाइजेशन सिस्टम भी दुरुस्त होता है। साथ ही बॉडी के रक्त को भी साफ रखने में मददगार होती है। इस कॉफी के पीने से हाइपरटेंशन की भी दिक्कत नहीं होती।
एनिमल एक्टिविस्ट के निशाने पर है उद्योग :
शुरू में तो सिविट जानवरो को बड़े हवादार पिंजरों में रखा जाता था जहाँ वो आराम से घूम फिर सकते थे। लेकिन जैसे जैसे इस कॉफी की डिमांड बढ़ने लगी तो लोगो ने उनको छोटे छोटे पिंजरों में रखना शुरू कर दिया जैसे की हमारे यहाँ पोल्ट्री फ़ार्म में मुर्गियों को रखा जाता है , ताकि कम जगह में ज्यादा उत्पादन ले सके। इससे इन जानवरो की हालत बहुत दयनीय हो गई जिसका की एनिमल एक्टिविस्ट पुर जोर विरोध कर रहे है उनकी मांग है की इन्हे खुले बाडो में रखा जाए।
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