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जयगढ़ फोर्ट के खजाने की मिस्ट्री | खजाने के लिए इंदिरा गांधी ने खुदवा दिया था किला

Posted on June 26, 2017 by Pankaj Goyal

Mystery of Jaigarh Fort Treasure | 25 जून 1975 को देश में इमरजेंसी लगाई गई थी। इमरजेंसी के दौरान जयगढ़ किले में पांच महीने तक चली खुदाई के बाद इंदिरा सरकार ने भले ये कहा हो कि कोई खजाना नहीं मिला, मगर जो सामान बरामद बताया गया और उसे जिस तरीके से दिल्ली भेजा गया वह कई सवाल छोड़ गया।

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खजाने की खोज के लिए खुद संजय गांधी पहुंचे थे जयपुर
आपातकाल के दौरान स्वर्गीय संजय गांधी के नाम की तूती बोलती थी और जयपुर में यह बात आम हो चली थी कि संजय गांधी की निगरानी में सब कुछ हो रहा है और गड़ा हुआ धन इंदिरा गांधी ले जाएंगी। एक बार संजय गांधी अचानक अपना छोटा विमान उड़ाकर सांगानेर हवाई अड्डे पहुंचे, तब अफवाह फैल गई कि जयगढ़ में दौलत मिल गई है और संजय गांधी विमान लेकर जयपुर दौलत बटोरने पहुंच गए हैं। सेना के आला अफसर एक-दो बार निरीक्षण के लिए जयगढ़ आए और आसपास हैलिकाॅप्टर से लैंडिंग की तो, यह अफवाह भी फैली की जयगढ़ में दौलत मिल गई है और सेना के हैलिकाॅप्टर इंदिरा गांधी और संजय गांधी के आदेश पर माल दिल्ली ले जाने के लिए आए हैं।

ऑर्मी ने खोद डाला पूरा किला
खुदाई पूरी होने के बाद ये बताया गया कि महज 230 किलो चांदी और चांदी का सामान ही मिला है। सेना ने इन सामानों की सूची बनाकर और राजपरिवार के प्रतिनिधि को दिखाई और उसके हस्ताक्षर लेकर सारा सामान सील कर दिल्ली ले गई। ट्रकों का काफिला जब दिल्ली लौटने लगा तो नए सिरे से अफवाह फैल गई कि जयपुर-दिल्ली का राजमार्ग पूरे दिन बंद कर दिया गया और सेना के ट्रकों में जयगढ़ का माल छुपाकर ले जाया गया है। बताया जाता है कि इंदिरा गांधी और संजय गांधी के आदेशानुसार दिल्ली छावनी में रख दिया गया।

भुट्‌टो ने मांगा था पाकिस्तान का हिस्सा
अगस्त 11, 1976 को भुट्टो ने इंदिरा गाँधी को एक पत्र लिखा कि आपकी सरकार जयगढ़ में खजाने की खोज कर रही है। इस बाबत पाकिस्तान अपने हिस्से की दौलत का हकदार इस कारण है कि विभाजन के समय ऐसी किसी दौलत की अविभाजित भारत को जानकारी नहीं थी। विभाजन के पूर्व के समझौते के अनुसार जयगढ़ की दौलत पर पाकिस्तान का हिस्सा बनता है। भुट्टो ने लिखा था कि ‘पाकिस्तान को यह पूरी आशा है कि खोज और खुदाई के बाद मिली दौलत पर पाकिस्तान का जो हिस्सा बनता है वह उसे बगैर किसी शर्तों के दिया जाएगा।’

इंदिरा गाँधी ने अगस्त में आई भुट्टो की चिट्ठी का जवाब ही नहीं दिया। इसके बाद आयकर, भू-सर्वेक्षण विभाग, केन्द्रीय सार्वजनिक निर्माण विभाग और अन्य विभिन्न विभागों को जब खोज में कोई सफलता नहीं मिली तो इंदिरा गाँधी ने खोज का काम सेना को सौंप दिया। लेकिन जब जयगढ़ से सेना भी खाली हाथ लौट आईं, तब इंदिरा गांधी ने 31 दिसम्बर 1976 को भुट्टो को लिखे अपने जवाब में कहा कि उन्होंने विधि-विशेषज्ञों को पाकिस्तान के दावे के औचित्य की जांच के लिए कहा था। विशेषज्ञों की राय है कि पाकिस्तान का कोई दावा ही नहीं बनता। इंदिरा गाँधी ने यह भी लिखा कि जयगढ़ में खजाने नाम की कोई चीज ही नहीं मिली। लेकिन अरबी पुस्तक ‘तिलिस्मात-ए-अम्बेरी’ में लिखा है कि जयगढ़ में सात टांकों के बीच हिफाजत से दौलत छुपाई गई थी। शायद इसी किताब के हवाले से भी पाकिस्तान ने दावा किया होगा।

आखिर कहां गया खजाना?
जयगढ़ में खोज और खुदाई की खबरें देने वाले वरिष्ठ पत्रकर राजेन्द्र बोड़ा बताते हैं कि आपातकाल में जबकि राजनीतिक या सरकार विरोधी कोई खबर कोई अखबार नहीं छाप सकते थे उस समय जयगढ़ संबंधी खजाने की खोज की अफवाहों से भरी खबरों को पाठकों ने पूरा जायका लेकर पढ़ा। यह खबरें उस वक्त भी आम थीं कि भले ही पूर्व राजपरिवार के खजाने का एक बड़ा हिस्सा जयपुर को बसाने में खर्च हो गया था, मगर जवाहरात तब भी सुरक्षित थे। मानसिंह द्वितीय ने अपने काल में जयगढ़ के खजाने के एक बड़े हिस्से को मोतीडूंगरी में रख दिया था। कानौता के जनरल अमरसिंह की डायरी में भी लिखा हुआ है कि मानसिंह ने जयगढ़ के किलेदारों को बदल दिया। इतिहासविद् डाॅ. चन्द्रमणी सिंह सवाई मानसिंह की प्रशंसा में कहती हैं कि भारत सरकार से हुए कोवेनेन्ट के दौरान मानसिंह ने चतुराई से इस पूरी दौलत को राजपरिवार की निजी संपत्ति बता दिया।

खवासजी के पास था बीजक, जिसके आधार पर चला खोज अभियान
28 जुलाई 1948 में बालाबख्श की 92 वर्ष की उम्र में मृत्यु हो गई, बीजक और दस्तावेज उनके पुत्रों लेखराज और गेगराज के पास रह गए। इसके बाद गेगराज जो परिवार में ही एक गौरीशंकर के घर गोद चले गए थे के पुत्रों महेश कुमार, जयसिंह, गिर्राज, श्याम सुन्दर और सुदर्शन के पास यह दस्तावेज रहे।

सुदर्शन टांक के अनुसार, उनके बड़े भाई जयसिंह जो कोटा में रहकर पत्थर की खान चलाते थे ने कभी किसी वकील को इस प्रकार के दस्तावेज उनके पास होने का जिक्र किया होगा। इसके बाद गुप्तचर एजेंसियां उनके पीछे लग गई और एक दिन पूछताछ के लिए उन्हें दिल्ली ले गई। पूछताछ के दौरान बीजक उनके पास होना जयसिंह ने स्वीकार किया और उसके बाद उसकी फोटोकाॅपी गुप्तचर एजेंसियों को सौंप दी।

इस बीच यह पता चला कि जयपुर रियासत में बड़े ओहदे पर रहे राव कृपाराम के पुत्र राव किस्तूरचन्द के परिवार ने इसी तरह के दस्तावेज जो संभवतः चमड़े पर लिखे गए थे, जयपुर के आखिरी महाराजा सवाई भवानीसिंह को सौंप दिए थे जिसमें लगभग वही सभी विवरण थे जो बालाबख्श के परिवार के पास पाए गए बीजकों में थे।

सुदर्शन टांक बताते हैं कि जयगढ़ में खजाने की खोज के समय आयकर अधिकारी आयुक्त जे.सी. कालरा जयसिंह को जयगढ़ के भीतर ले जाते और जयसिंह के बीजक के अनुसार खजाने की खोज होती। किले के अंदर सभी का प्रवेश वर्जित था, लेकिन जयपुर के पुराने बाशिंदे और नवाब साहब की हवेली के मालिक त्रिलोकीदास खण्डेलवाल को उनकी आयकर आयुक्त कालरा से घनिष्ठता के कारण खोज और खुदाई के दौरान किले के अंदर जाने का कई बार मौका मिला।

मंदिर खुदाई की बात पर उखड़ गए थे आयकर आयुक्त
इण्डियन ट्रेजर ट्रोव एक्ट के अन्तर्गत किसी गुप्त खजाने की जानकारी देने वाले को खजाने के मूल्य का दो प्रतिशत मिलता था। इसी लोभ में खवास बालाबख्श के परिवार वालों ने आयकर विभाग को पूरी जानकारी दे रखी थी।

त्रिलोकीदास खण्डेलवाल बताते हैं कि एक दिन आयकर आयुक्त सी.एन. वैष्णव जो कालरा के स्थान पर आयुक्त बनकर आए थे, ने जयगढ़ के अंदर जयसिंह खवास को डपट कर वास्तविक खजाने की जानकारी देने को कहा तो जयसिंह खवास ने काल भैरव के प्राचीन मन्दिर के तल को खोदने के लिए कहा।

यह सुनना था कि वैष्णव जो महाराष्ट्र के कुलीन ब्राह्मण थे, ने जयसिंह को खूब बुरा-भला कहा। खण्डेलवाल के अनुसार, इसके बाद खोज-खुदाई की दिशा बदली और भारत सरकार ने यह काम सेना की 37वीं इंजीनियर्स कोर को दे दिया।

1726 में बना था जयगढ़ दुर्ग, 6 साल के लिए रहा राष्ट्रीय स्मारक
जयसिंह द्वितीय में 1726 में जयगढ़ दुर्ग बनवाया था। आजादी के बाद भी ये राजपरिवार की संपत्तियों में ही शुमार रहा था। हालांकि, आपातकाल में खजाने की खोज के लिए केंद्र ने 25 फरवरी 1976 को इसे राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर दिया था।

बाद में ब्रिगेडियर भवानी सिंह के प्रयासों से मई, 1982 से ये किला दोबारा राजपरिवार की संपत्ति बन गया। भवानी सिंह ने 11 दिसम्बर 1982 को जयगढ़ का कब्जा लेने के तीन दिन बाद ही इस किले को जयगढ़ पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट के नाम से पंजिकृत करा लिया। 27 जुलाई 1983 को किला सार्वजनिक हो गया।

Post Credit – प्रकाश भंडारी (Bhaskar.com)

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