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Lok Katha In Hindi

लोक कथा – काम और कर्तव्य में अंतर

Posted on June 26, 2018 by Pankaj Goyal

Lok Katha In Hindi | अधिकतर लोग ऐसे हैं जो दैनिक जीवन की छोटी-छोटी परेशानियों के कारण चिंतित रहते हैं और सभी सुविधाएं होने के बाद भी दुखी रहते हैं। चिंताओं के संबंध में एक लोक कथा प्रचलित है। इस प्रसंग में एक राजा सभी सुख-सुविधाएं होने के बाद भी हमेशा चिंतित रहता था। राजा के गुरु ने सभी चिंताओं का समाधान कैसे किया, जानिए इस प्रसंग में…

Lok Katha In Hindi

बहुत समय पहले की बात है एक राजा था। उसे राजा बने लगभग दस साल हो चुके थे। पहले कुछ साल तो उसे राज्य संभालने में कोई परेशानी नहीं आई। फिर एक बार अकाल पड़ा। उस साल लगान न के बराबर आया। राजा को यही चिंता लगी रहती कि खर्चा कैसे घटाया जाए ताकि काम चल सके और भविष्य में फिर अकाल न पड़ जाए। उसे पड़ोसी राजाओं का भी डर रहने लगा कि कहीं हमला न कर दें। एक बार उसने कुछ मंत्रियों को उसके खिलाफ षडयंत्र रचते भी पकड़ा था।

राजा को चिंता के कारण नींद नहीं आती थी। भूख भी कम लगती। शाही मेज पर सैकड़ों पकवान परोसे जाते, लेकिन वह दो-तीन कौर से ज्यादा खा नहीं पाता। राजा अपने शाही बाग के माली को देखता था। जो बड़े स्वाद से प्याज व चटनी के साथ सात-आठ मोटी-मोटी रोटियां खा जाता था।

जब राजा के राजगुरु ने ये सब देखा तो उन्होंने राजा से कहा कि अगर तुमको नौकरी ज्यादा अच्छी लगती है तो मेरे यहां नौकरी कर लो। मैं तो ठहरा साधू मैं आश्रम में ही रहूंगा, लेकिन इस राज्य को चलाने के लिए मुझे एक नौकर चाहिए। तुम पहले की तरह ही महल में रहोगे। गद्दी पर बैठोगे और शासन चलाओगे, यही तुम्हारी नौकरी होगी।

राजा ने राजगुरु की बात मान ली और वह अपने काम को नौकरी की तरह करने लगा। फर्क कुछ नहीं था काम वही था, लेकिन अब वह जिम्मेदारियों और चिंता से लदा नहीं था। कुछ महीनों बाद उसके गुरु आए। उन्होंने राजा से पूछा कहो तुम्हारी भूख और नींद का क्या हाल है। राजा ने कहा कि मालिक अब खूब भूख लगती है और आराम से सोता हूं।

गुरु ने राजा को समझाया कि देखो सबकुछ पहले जैसा ही है, लेकिन पहले तुमने जिस काम को बोझ की गठरी समझ रखा था। अब सिर्फ उसे अपना कर्तव्य समझ कर रहे हो। हमें ये जीवन कर्तव्यों को पूरा करने के लिए मिला है। किसी चीज को अपने ऊपर बोझ की तरह लादने के लिए नहीं मिला है। काम कोई भी हो, चिंता उसे और ज्यादा कठिन बना देती है। जो भी काम करें उसे अपना कर्तव्य समझकर ही करें। ये नहीं भूलना चाहिए कि हम न कुछ लेकर आए थे और न कुछ लेकर जाएंगे। इस बात का ध्यान आप भी रखेंगे तो हमेशा सुखी रहेंगे।

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